Monday, April 2, 2012

बोलते वि‍चार 54- नौकरी में निष्ठा


नौकरी में निष्ठा

आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 

अपनी नौकरी के प्रति वफादार होना सबसे बड़े ईमान की बातों में से एक है। कारण यह है कि उसी से व्यक्ति को पेट पालने का स्थिर आधार मिलता है और उसीसे उसका सामाजिक महत्‍व निर्धारित होता हैं।
एक साहब महाविद्यालय में स्थायी व्याख्याता हैं और साथ में वहाँ के एक छात्रावास के अस्थायी वार्डन भी हैं। उनका वेतन उनके वार्डन होने के भत्‍ते से बीस गुने से भी अधिक है; लेकिन वे दिन-रात वार्डनी ही करते रहते हैं, व्याख्याता पद की मानी खाते हैं। उनकी सारी वफादारी ‘वार्डनी’ पर केंद्रित है, क्योंकि उसकी कमाई ‘उपरी आमदनी’ है, जो छिन सकती है। जबकि व्याख्याता वाली आमदनी उनके लिए बँधी-बँधाई जागीर बन चुकी है।
यह ‘ऊपरी आमदनी’ विविध रूपों में आदमी को निष्ठाहीन और गैर जिम्मेदार ही नहीं, कृतध्न और भ्रष्ट भी बनाती जा रही है। लोग कार्यालय के मुख्य समय में काम नहीं करते और ओवर टाइम के लिए रास्ता तैयार करते रहते हैं। उनकी मूल फाइलें पड़ी रहती हैं, जिन्हें निबटाना उनका प्रथम कर्तव्य के समान होना चाहिए, क्योंकि उसी काम की उन्हें तनख्वाह मिलती है; पर वे ऊपरी पारिश्रमिक के कार्मी या अतिरिक्त धंधों में लिप्त रहते हैं। चपरासी लोग चमरासीगीरी ठीक से नहीं करेंगे, वे गाय-भैंय पालकर उसका दूध बेचने के काम को अपना पहला धर्म मान लेंगे। ऑफिस की अवधि में वे घास काटने के लिए चल देंगे। बड़े-बड़े प्रोफेसर खुद अपनी संख्या के विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाएँगे, पर दुनिया भर से अपने संबंध जोड़ने और टी.ए.,डी.ए. के चक्कर में आएदिन बाहर की दौड़ लगाते रहेंगे।
एक कथन है कि मूल की अपेक्षा ब्याज और बेटे-बेटी की अपेक्षा पोता-नाती ज्यादा प्यारा होता है। लेकिन आदमी यह भूल जाता है कि यदि मूल ही न हो तो ब्याज कहाँ से आएगा और जब बेटा-बेटी ही न हो तो पोते-नाती का अस्तित्व कहाँ से होगा।

 सही ओवर टाइम और अर्जित पारिश्रमिक गलत चीजें नहीं हैं; लेकिन ऊपरी आमदनी यदि कियी काम के लिए पूर्व निर्धारित समय में कोई दूसरा काम करके या मूल काम को सिर्फ ओवर टाइम में करके बढ़ाई जाती है, अथवा उसे रिश्वत आदि के जरिए बढ़ायता जाता है तो वह नैतिकता और वैधानिकता दोनों दृष्टियों से वांछनीय नहीं कही जा सकती।

आदमी यदि अपनी नौकरी से संबंधित मूल काम निष्ठा के साथ नहीं करता है और किसी अन्य काम के प्रति वफादारी निभाता है तो उसमें अपना पेट पालनेवाले के प्रति भी अहसानमंद न होने का अवगुण पनपता रहेगा। उसे खुद अपनी चमड़ी को छोड़कर सारी दुनिया से शिकायत रहेगी; उसमें संतोष और उससे मिलने वाले सुखी की हमेशा कमी रहेगी।

अच्छे और बुरे कर्मचारी सभी जगह हुआ करते हैं, बुरे कर्मचारी ‘बुरे’ प्रायः इसलिए होते हैं कि वे कामकाम करते हैं और अपनी नौकरी में दिन-रात अभाव देखते रहते हैं। इसके विपरीत, अच्छे कर्मचारी ‘अच्छे’ इसलिए होते हैं कि उन्हें वफादारी के साथ अपना काम पूरा करने से इतनी फुरसत ही नहीं मिलती कि वे अभावों को सोचने में अपना समय बरबाद करें। वरना अभाव कहाँ नहीं हैं और अपूर्णता किस व्यवस्था और किस मानव में नहीं है? अगर आदमी सिर्फ यह सोचकर नौकरी किया करे कि उसकी सौ में से सौ बातें जब भगवान् भी पूरी नहीं किया करते तब भला नौकारी में यह कैसे संभव होगा कि उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो जाएँ, तो उसे अपनी बहुत सी शिकायतें निर्मूल लगने लगेंगी। ‘नौकरी’ की अर्थ ‘सेवा’ है। ‘सेवा’ अपनी नहीं, दूसरों की होती है। जो लोग नौकरी करके सिर्फ अपनी सेवा चाहते हैं, वे उस नौकरी के लिए अयोग्य और कुपात्र होते हैं।

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