Sunday, July 31, 2011

बोलते वि‍चार 5 - अपनों के प्रति कमज़ोरी और पक्षपात

Bolte Vichar 5

आलेख व स्‍वर - डॉ.रमेश चन्‍द्र महरोत्रा


बच्चे माता पिता की कमज़ोरी हुआ करते हैं। इसका मतलब यह है कि जो जिस को जितना अधिक चाहता है, वह उसके लिए उतना ही चिंतित और दुबला हुआ करता है और उसकी उतनी ही सुरक्षा और उन्नति के लिए बेचैन हुआ करता है।शेक्सपियर ने इस तथ्य से मिलता-जुलता थोड़े अतिरिक्त भाव को जोड़ते हुए लिखा है-‘जो जिसे जितना अधिक चाहता है,वह उसके बारे में उतना ही संदेह किया करता है।’इस कथन को हम इस उदाहरण से समझें कि यदि बच्चे को स्कूल से आने में थोड़ी भी देरी हो गई,तो मां-बाप आदि को तरह-तरह के संदेह होने शुरु हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि प्रेमी ने प्रेमिका को एक-दूसरे को अन्जान व्यक्ति सें हँसते-बोलते देख लिया,तो उनके मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के संदेह पैदा हो जाते हैं। उपर्युक्त बात को दूसरी शब्दों में इस प्रकार से कहा जा सकता है कि व्यक्ति उसका ध्यान ज़्यादा रखता है, जिसे ज़्यादा चाहता है; जैसे सामान्य स्थितियों मां बेटे का,पिता बेटी का और दोस्त दोस्त का। ध्यान रखने की यह बात बेजान चीजों पर भी लागू होती है। सफ़र करते समय सैकड़ों के बीच हमारी निगाह अपनी पोटली पर ही रहती है।


जब अपने आदमियों और अपनी चीजों के प्रति लगाव का होना एक सहज वृत्ति है,तो प्रश्‍न है कि हमें अपनों के लिए ‘क्या’ और ‘किस सीमा तक’ करना चाहिए- इस शर्त के साथ हम पर पक्षपाती होंने का आरोप न लगे।

भगवान बुद्ध यदि अपना सारा लगाव महल के भीतर ही लगाए रखते, तो संसार को कुछ नहीं दे पाते। भगवान कृष्ण भी यदि अपनी गोपियों से आगे न बढ़े होते,तो द्वारिकाधीश बन कर परवर्ती कर्तव्य पूरे नहीं कर पाते। इसी तरह आप भी अपनों के प्रति आवश्‍यकता से अधिक लगाव और अपनों के प्रति कमज़ोरी दिखाकर अपने को छोटा न बनाइए और दूसरों का अधिकार और प्राप्य न छीनिए। यदि आप को किसी अपने को किसी पद पर पहुंचवाना है,तो उसके लिए पहले उसे पूरी तरह से आवश्‍यक योग्यताओं से भर दीजिए, वरना किसी अयोग्य ‘अपने’ को वह पद दिलाने से बहुत बड़ा अहित हो सकता है; जैसे, गल़त ‘अध्यापक’ आगे की पीढियाँ खराब कर सकता है, गल़त ‘इंजीनियर’ दर्जनों प्रकार की दुर्घटनाओं के लिए रास्ता खोल सकता है, गलत ‘डाक्टर’ कितने ही मरीज़ों का बेड़ा गर्क कर सकता है, गल़त ‘अफ़सर’ विकास की समूची दिशा को ही विनाशकारी मोड़ दे सकता है। कुल मिला कर, सही जगह पर सही पात्र न बैठ पाने के कारण ही प्रगति की जड़ें कमज़ोर हो पड़ती हैं और भ्रष्टाचार का दानव फलता-फूलता है। ज़ाहिर है अपनों के प्रति  हमारी कमज़ोरी कई बार पक्षपात की जनक बन जाती है और औचित्य में बाधा पहुँचा कर भारी अक्षमताओं और अव्यवस्थाओं को प्रश्रय देती है।कितना सरल गणित है कि ‘कमज़ोरी दिखाना’ बराबर है ‘स्थिति बिगड़ने देना’ और ‘कमज़ोरी न दिखाना’ बराबर है ‘सुधार करना।’ 

जब आप कमज़ोरी न दिखा कर किसी अपने को डाँटते-फटकारते या अन्य दण्ड देते हैं, तो आपका लक्ष्य सुधार करना ही होता है, लेकिन जब आप कमज़ोर बन कर कभी कोई सख्त कार्रवाही नहीं करते हैं, तो निश्‍ि‍चत रुप से अयोग्यता और अनुषासनहीनता को सिर उठाने की छूट देते हैं। बीमारी को न रोकने से वह बढ़ती चली जाती है। जब आप कमज़ोरी न दिखा कर किसी गलत बात के आगे नहीं झुकते हैं, तो आप अपने दृढ़ व्यक्तित्व से समाज की दीवारें बनाने में प्रवृत्त हो जाते हैं तब आप अपने ढुलमुल व्यक्तित्व से समाज में निम्न स्तर के अवसरवाद को बढ़ावा नहीं देते हैं।

जब आप कमज़ोरी न दिखाकर किसी के प्रति पक्षपात करते हैं,तो आप सामान्य श्रेणी के आदमियों से उपर उठकर छोटे हितों की तुलना में बड़े हितों के पोषक बन जाते हैं, लेकिन जब कमज़ोर बनकर स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने लगते हैं तब आप कमज़ोर बनकर अंतरात्मा के सामने गिरे हुए होते हैं। अंत में अपने से यह सवाल कीजिए कि मनुष्य का जन्म सबसे अच्छी योनि में किसलिए हुआ है; वह सारे प्राणियों में श्रेष्ठ क्यों है? अपनी कमज़ोरी दिखाने के लिए या दूसरों की भी कमज़ोरि‍यों को  दूर करने के लिए ?

Production - Libra Media, Bilaspur
Recording, editing, typing, blogging---sangya, kapila

1 comment:

  1. संज्ञा कपिला
    आशीर्वाद
    अपनों के प्रीति सुंदर प्रस्तुति

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